भटकता मन, भटकता जीवन!

By ver123ma, January 15, 2018

न जानूं मैं कैसे, परेशान किससे? जानता मैं हूँ सब कुछ, फिर अंजान किससे? हूँ न रज भी मैं पैरों की यहाँ पर किसीके, रखता हूँ फिर भी कितना मैं अभिमान किसपे??
फिर भी न जाने क्यों?
कहाँ ??
और कैसे ???
भटक मैं रहा हूँ?…..भटक मैं रहा हूँ??…
सच में मैं भटक रहा हूँ!!!!..
पता है मुझे कि मैं भटक रहा हूँ, फिर भी दलदल से निकल न रहा हूँ।
दलदल भी ऐसा है जो सबसे अलग है निकलना भी चाहूँ निकल भी न पाऊँ,
खींचे है मुझको ये अपनी तरफ ही, आगे चलना भी चाहूँ तो मैं चल न पाऊँ,
फंसी नाव मेरी है मजधार में अब नही है पता के किधर मैं तो जाऊँ,
सोंचता हूँ करूँ कुछ मैं उनके भी खातिर।
मरते हैं रोज जो सिर्फ जीने के खातिर ।।
है पता अब मुझे कष्ट मेरा बड़ा है,
ऊंचाई के आगे ऊँचा पर्वत खड़ा है।
उस पर चढाने की सारी कला मुझको आती,
इरादा मेरा तन से उसके बड़ा है।।
खाऊँ चोट अपने मैं इक-इक कदम पर,
चढने चला फिर भी अपने ही दम पर।
अब तो पत्थर भी मेरा ये मन हो चुका है,
ये ह्रदय भी मेरा अब तो वन हो चुका है,
सीखा है कुछ भी जो वो समय ने सिखाया,
सर मेरा सिर्फ आगे समय के झुका है।।
छोड़ूंगा नहीं जब तक सांसें चलेंगीं, जोर किसका समय पर अब तक चला है।
हैं विश्वाश मुझको बस अपने करम पर,
है करम ही यहाँ जो साथ अपने चला है।।

“~~कुमार रंजीत~~”!!®!!..

4 Comments

  1. rani jain says:

    अपने मन की कश्मकश को बहुत सुन्दरता से शब्दों में ढाला हैं

  2. rani jain says:

    अपने मन की कश्मकश को बहुत सुन्दरता से शब्दों में ढाला हैं

What do you think?

Thanks For Your Comment

Skip to toolbar