जीवन दर्पण(1)

By ver123ma, February 12, 2018

इस धरा का गगन से मिलन हो गया,
धन्य-धन्य अब तो मेरा ये मन हो गया।
न कोई सोच है न कोई कामना,
बरषा बादल ये तन भी रतन हो गया।।

अब तो उल्टी दिशा में पवन बह रही,
जाने किसने है रोका चमन कह रही।।
हम तो मजधार से बस निकल ही थे,
पास आओ न जाओ,घटा कह रही।।

“~~कुमार रंजीत~~”!!®!!..

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